| صيد | |
| کـه صـيد افکـني کـرد عزم شکار | شـنـيـدم ز پـيـشـيـنـيـان اين سخن |
| غـزالـي سـيـه چـشـم در رهـگـذر | پـي صـيـد مـي گـشـت نـاگـاه ديـد |
| بـخـم کـمـنـد انـدر آمـد شـکــــار | چـو بـنـد کـمنـدش بر او حلقه کرد |
| بـبـرد سرش را در آن گـيـرودار | هـمـي خـواسـت کـز خنجر آبگون |
| فــرو ريخـت آن آب در مرغــزار | ز حـلـقـوم آن صـيـد آبـي چـکـيـد |
| که: بشنو ز من شرح اين دل فکار | بـه صـيـاد آن صـيـد دلخـسته گفت |
| سـرچـشمه بودم در آن کـوهسار | من ايـنـدم که بگـذشتم از پيش تو |
| کـه شايد رسانم به غـم ديده يار | به حـلـقـوم از آن آب بـرداشـتـم |
| تــــن مـسـتـمـنـد و دل بـيـقـــرار | که چندي است از درد پيچان شده |
| بـجـز من نبودش کسي غـمگسار | ز من آب مي خواست آن خسته جان |
| که يارم نشسته است چشم انتظار | از اينروست اين حسرت و آه من |
| بـتـرسـم کـه او جـان سپارد بزار | بـه انـديـشـه جـان خـود نـيـسـتــم |
| گـرفـتـار ايـن خـــنـــــــجـر آبـدار | نـدانـد کـنـون مـن بـه بـنـد تــوام |
| بـبـخـشـاي بر جـان آن دل فـکار | گـرت رحمتي نـيست بر جان من |
| کنون شرح صـياد خود گوش دار | بـدو گـفـت ايـن صـيـد افکـنده ام |
| که چندي فتاده است بـيمار و زار | مرا نـيـز يـاري است چـون يار تو |
| عـلاجـش نـمودنـد ران شـکــــار | حـکـيـمـان به تجـويـز بـيـمـاريـش |
| کـه شايد بـبـخـشد بر او کـردگـار | ولـي مـن بـبـخـشـم کـنـون جـان تو |
| بـر او مـرحـم آيـد ز پـروردگــار | کـه بـشـنـيـده ام هـر که رحم آورد |
| بلي هر که راه بدي نسپرد | |
| نـبـيـنـد گـزنـد بـد روزگــار | |
براي بازگـشت به صـفـحه قـبل لـطـفا اين صفـحـه را بـبنديد